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अहसास


                    ग़ज़ल गुलदस्ता


1.)

आज से दिल ये यारा तुम्हारा हुआ ।

भूल जाएंगे जो भी तमाशा हुआ ।।


दे दिया दिल तुम्हें इक नज़र में सनम ।

सोचना मत ये कोई अजूबा हुआ ।।


मेरी तारीफ़ करना किसी और से ।

प्यार करने का ये क्या तरीक़ा हुआ ।।


रोककर एक दिन उसने कह ही दिया ।

चाँद लगता जमी पर है उतरा हुआ ।।


आप इतनी हिफाज़त किया मत करो ।

हम हुऐ या कोई फिर ख़ज़ाना हुआ ।।


रंज  हमको  रहेगा  इसी बात का ।

क्यो न समझे कहाँ पानी ठहरा हुआ ।।


मुझको आग़ोश में लेना मुश्किल बहुत ।

टूटकर है बहुत साथी  बिखरा हुआ  ।।


2.)


अपना   कोई   छलता  है ।

दिल अन्दर से जलता है ।।


प्यार   गवाही   जब   माँगें ।

रिश्ता वो  कम  चलता है ।।


पत्थर   भी   पिघला  करते ।

इन्सा  कहाँ    पिघलता  है ।।


उम्र   छुपाना   है  मुश्किल  ।

मौत गणित जब चलता है ।।


जंगल  में  जब  आग  लगे ।

कोई  न  कोई  जलता  है ।।


वो  जब  आऐं   तो  लगता ।

जैसे   चाँद   निकलता   है ।।


वो   जब  जाऐं   तो  लगता ।

जैसे   सूरज    ढलता    है ।।


ओझल  मत हो जाना तुम ।

साथी  को ये खलता है ।।


4

3.)

लिख रहा हूँ मैं कहानी दिल से उस दिलदार की ।

थी नही परवाह उसको तीर या तलवार की ।।


आशिक़ी का ये जुनूँ आँखों में उसकी देखना ।

वो मुक़म्मल इक ग़ज़ल थी सादगी अश आर की ।।


चैन हमको भी कहाँ उसके बिना था दोस्तो ।

मर्ज से कब बन गयी वो मुझ दवा बीमार की ।।


कतरनों को जोड़कर भी बन गया देखो लिबास ।

छू नही इसको रहे क्यों क्या वज़ह इंकार की ।।


मत करो मेरा यकीं वादे मुताबिक मैं चला ।

खंडहर अब भी गवाही दे रहे है प्यार की ।।


प्यार में तक़रार भी इंकार भी इक उम्र तक ।

दिल जवाँ हरदम ही रखना उम्र हो सौ पार की ।।


देखते हम  रोज साथी  मन अभी अतृप्त है ।

प्य़ास आँखों में बसी है उसके ही दीदार की ।।


4.)

बेवज़ह  दिल  दुखाना  नही ।

दिल किसी से लगाना नही ।।


जो   सिखाये  सदाक़त  तुम्हें ।

उसको हरगिज भुलाना नही ।।


जान करता जो तुम पर निशार ।

उसको  फिर आज़माना  नही ।।


लोग   उन्माद यूँ  कर   रहे ।

क्या  इसे  मुल्क  माना  नही ।।


अंग     प्रत्यंग    क्यों   बेचते ।

मुँह  ख़ुदा  को दिखाना नही ।।


मौतों पर भी सियासत है मौन ।

देखा    ऐसा   ज़माना   नही ।।


अंधभक्तों   को साथी  मेरे ।

आईना   अब  दिखाना  नही ।।


5.)


दबे हो राज़ जब दिल में , तो बतलाना ही पड़ता है ।

सहन से दर्द़ हो ज्यादा ,तो छलकाना ही पड़ता है ।।


उड़ा ले जाऐ पल भर में , कोई आँखों से काज़ल को ।

उसे फिर देखकर नज़रों ,   से शरमाना ही पढ़ता है ।।


क़िताबें कम पढ़ी हमने ,    मगर चेहरे पढ़े ज्यादा ।

दिखाकर रंगबाजी फिर ,  से बतलाना ही पड़ता है ।।


लकीरें दिल पे मत खींचों , मिटाना है बहुत मुश्किल ।

बनाऐ  रेत के  घर जब ,   उन्हें ढाना  ही पड़ता है ।।


समंदर ने बुझाई ये ,   बताओ प्यास किस किस की ।

नमक भी ज़िंदगी सबकी , ये समझाना ही पड़ता है ।।


रखो  ज़िन्दादिली साथी ,     उदासी को दिखा ठेंगा ।     

मुसीबत को चिड़ाना हो ,  तो मुस्काना ही पड़ता है ।।


कवि बृजमोहन श्रीवास्तव "साथी"  -

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